Monday, November 10, 2008

विदेशों में भारतीयों की स्थिति











मनोज कुमार राठौर
विदेशों में भारतीयों ने अपने देश का नाम रोशन किया है। जापान की एक पत्रिका में छपे आकड़ों के अनुसार विदेशों में लगभग 30 प्रतिशत भारतीय नासा में वैज्ञानिक, 20 प्रतिशत डाॅक्टर और 25 प्रतिशत अन्य कंपनियों में अपनी सेवाएं प्रदान कर रहंे हैं। मीडिया और सरकारी रिपोर्टो में छपे आकड़़़़ों में भारतीयों की उपलब्धियों को प्रायः रेखांकित किया जाता है, लेकिन इसके बावजूद भी भारतीयों की स्थिति विदेश में दयनीय बनी हुई है। भारतीय विदेशी चमक-दमक में इतने डूब जाते हैं कि वह अपने देश को भी भूल जाते हैं। अधिकतम भारतीय विदेशों में काम करना पसंद करते हैं। भारतवासियों की धारा का प्रवाह विदेश की ओर है और वह तीव्र गति से इस ओर प्रस्थान कर रहे हैं।

ब्रिटेेन के नागरिक अप्रवासी भारतीयों को जिस छवि को प्रतिदिन देखते हैं उसें लेेकर उन्होंने अपनी-अपनी कुधारणाएं बना रखी हैं। गोरी चमड़़़ी के सिरमौर समझने वाले आकों को यह लगता है कि अप्रवासियों हमारी नौकरियां और रोजगार छीन रहे हैं। वहां भारतीयों की बढ़ती संख्या से उन्हें अपना देश भी अपना नहीं लगता है, इसलिए वह भारतीयों के साथ भेदभाव करते हैं। वहां भारतीयों सम्पत्ति का मूल्य गोरों की सम्पत्ति मूल्य के मुकाबले बहुत कम है। इससे अंदाजा लगाया जाता है कि ब्रिटेन में भारतीयों की स्थिति कैसी होगी?

विदेशों मेें भारतीयों पर अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है, लेकिन हमारी सरकार का इस ओर ध्यान नहीं है। अमेरिका की एक जहाज निर्माण कम्पनी ‘सिग्नल इन्तरनेशनल ’ जो मिसीसिपी में स्थित है। करीब 100 भारतीय श्रमिकों ने कम्पनी के खिलाफ शोषण का आरोप लगाया था लेकिन कंपनी ने उनके इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया । उन्हंांेने इस संदर्भ में भारत सरकार से गुहार लगाई। भारत सरकार ने उनकी गुहार तो सुनी लेकिन उसे भी अनसुनी करने की भरपूर कोशिश की गई। भारत सरकार ने अपना एक दल अमेरिका जांच करने के लिए भेजा। अमेरिका गए दल ने जब भारत जाकर अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें शोषण संबंधित मामले को गलत बताया गया था। रिपोर्ट में भारतीयों के शोषण की जानकारी को छूटी साबित कर दी गई। इस बात का खुलासा श्रमिक वर्ग के नेता ने करा, उन्होंने कहा कि भारतीय दूतावास द्वारा भेजी गई टीम केवल सिग्रलपरिवार में काम करने वाले मजदूरों से ही मिल कर लौट गई । वह अन्य भारतीय मजदूरों से नहीं मिली। भारत सरकार के भेजे गए इन नमूनों की इस गलती से ऐसा लगता है कि अमेरिका सरकार ने इन्हें खरीद लिया था इसलिए तो अधूरी जानकारी लेकर भारत लौट गए। हमारे देश के यह हौनहार दूतवास तो लौट आए मगर उन 100 भारतीयों का क्या होगा, जिनका शोषण किया जा रहा है! इसी प्रकार अमेरिका के अलावा भी कई देशों में भारतीयों की स्थिति ठीेक नहीं है।

सभी हमसफर जाते है
कौन किसकी गांरटी लेता है
जिसकी और ध्यान गया
उस पर देश को गर्व होता है
जिसकी और ध्यान नहीं गया
वह शोषित होता है।

2 comments:

  1. विदेशों में रहनेवाले संपन्‍न लोगो को इस दिशा में पहल करना चाहिए।

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