Friday, September 12, 2008

लेख

एक ही थाली में भोजन करते थे अशफाक व बिस्मिल
मनोज कुमार राठौर
अशफाक से बिस्मिल इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने लिखा है-‘मेरे हृदय से यह विचार जाता रहा कि हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद है।’ वे बिस्मिल को हमेशा इस बात के लिए अनुरोध करते थे कि वे उर्दू में भी लेख व पुस्तक लिखें, ताकि मुसलमानों तक भी उनके विचार ।
अशफाक उल्ला खां एक देशभक्त क्रांतिकारी होने के साथ ही हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द की मिशाल भी थे। यही वजह है कि पं. रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां की मित्रता परवान चढ़ी। पहली बार बिस्मिल जब अशफाक से मिले, तो उन्होंने इस मुस्लिम छात्र की बातों का जवाब बड़े उपेक्षित मन से दिया। अशफाक उल्ला खां इससे विचलित नहीं हुए और बिस्मिल को यह विश्वास दिलाकर ही दम लिया कि वह भी एक सच्चे देशभक्त हैं। बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा में लिखा है-‘तुम अपने इष्टमित्रों द्वारा इस बात का विश्वास दिलाने की कोशिश की कि तुम बनावटी आदमी नहीं हो, तुम्हारे दिल में मुल्क की खिदमत करने की ख्वाहिश थी। अंत में तुम्हारी विजय हुई।...तुम सच्चे मित्र बन गये।...सबको आश्चर्य था कि एक कट्टर आर्य समाजी और एक मुसलमान का कैसा मेल?’ इन दोनों में अगाध प्रेम था। अधिकतर वे एक थाली में खाना खाया करते थे। अशफाक से बिस्मिल इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने लिखा है-‘मेरे हृदय से यह विचार जाता रहा कि हिन्दू-मुसलमान में कोई भेद है।’ वे बिस्मिल को हमेशा इस बात के लिए अनुरोध करते थे कि वे उर्दू में भी लेख व पुस्तक लिखें, ताकि मुसलमानों तक भी उनके विचार पहुंचे। एक बार अशफाक बीमार हुए और बेहोशी की हालत में वह ‘राम’ कह रहते थे। वहां मौजूद सभी को अचरज हुआ कि वह ‘राम...राम’ क्यों कह रहा है, उन्हें तो ‘अल्लाह-अल्लाह’ कहना चाहिए। पास मौजूद एक मित्र ‘राम’ के भेद को जान गये और फिर पं. राम प्रसाद बिस्मिल को बुलाया गया। दरअसल अशफाक उन्हें ‘राम’ कहकर ही पुकारते थे।
इस तरह दो पंथों की धाराएं एक हो गई थीं, जिनके प्रवाह का एक मात्र उद्देश्य था-भारत मां को पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त कराना। अपने इस मिशन के साथ 9 अगस्त 1925 को पं। रामप्रसाद बिस्मिल और अषफाक उल्ला खा ने चंद्रषेखर आज़ाद, राजेन्द्र लोहड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिन्द्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकनुद लाल और मन्मथ नाथ गुप्त के साथ मिलकर लखनऊ के नजदीक काकोरी में सरकारी ट्रेन में ले जाये जा रहे उस ख़जाने को लूट लिया, जो वास्तव में भारत का था। इस घटना में शामिल क्रांतिकारियों की तलाश में जगह-जगह छापे मारे जाने लगे। अंगरेज़ों ने एक-एक कर काकोरी की घटना में शामिल सभी क्रांतिकारियों को पकड़ लिया, लेकिन वे चंद्रषेखर आज़ाद को पकड़ने में असफल रहे। अंगरेज़ों ने बंदी बनाये जाने के बाद अशफाक उल्ला खां को सरकारी गवाह बनाने के लिए कई चालें चलीं, लेकिन वे विचलित नहीं हुए। उनका इरादा अटल था। भारत मां के इस सपूत पर अंगरेज़ों की किसी भी धमकी का कोई असर नहीं हुआ। अंगरेज़ों ने तो उन्हें हिन्दू-मुस्लिम अलगाव की मानसिकता में बंधने की भरसक कोशिश की और यहां तक कहा गया कि अगर भारत आज़ाद भी हो गया, तो तुम्हारी कौम को कुछ हासिल नहीं होगा। मगर अंगरेज़ शायद इस बात से बेखबर थे कि एक देषभक्त के लिए देष धर्म-सांप्रदाय से ऊपर होता है। यही बात अषफाक उल्ला के साथ भी थी। तभी तो उन्होंने अंगरेज़ों का मुंह यह कहकर बंद कर दिया कि ‘फूट डालो और शासन करो’ की दुर्भावनापूर्ण नीति में वह फंसने वाले नहीं हैं। इसलिए, अशफाक ने अंगरेजों के बहकावे में आने के बजाय देश की खातिर फांसी को गले लगा लिया है। उन्हें 19 दिसंबर 1927 को फांसी दे दी गई। इस घटना में शामिल अन्य सहयोगी क्रांतिकारियों को भी 17 से 21 दिसंबर 1927 के दौरान फांसी दे दी गई। अपने अंतिम दिनों में जेल में रहते हुए अषफाक ने कुरान पढ़ा। वे एक सच्चे मुसलमान, मित्र और इससे भी बढ़कर जांबाज देशभक्त थे। उनकी शहादत स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान ही नहीं था, बल्कि यह सांप्रदायिक एकता व सद्भावना की मिशाल है, जिसके दम पर ही देश में सुख-शान्ति कायम रह सकती है।

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